अपने कर्मों के परिणाम के लिए हम स्वयं जिम्मेवार हैं ईष्वर दोषी नहीं…- ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी

अपने कर्मों के परिणाम के लिए हम स्वयं जिम्मेवार हैं ईष्वर दोषी नहीं…- ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी


बिलासपुर, – परमात्मा हर मनुष्य आत्मा को विवेकयुक्त बुद्धि और स्वतंत्रता – ये दो गिफ्ट देते हैं। जिसके कारण हमें अपने अच्छे व बुरे कर्मों का ज्ञान होता है। जब भी हम गलत काम करते हैं तो हमारी बुद्धि, हमारा कॉन्शियस हमें अलाउ नहीं करता हमारा विवेक विरोध जरूर करता है लेकिन फिर भी इन्द्रियों के वश होकर हम अपने विवेक का खून कर देते हैं व गलत कार्य की ओर अग्रसर हो जाते हैं। इसलिए कभी-भी हमें अपने जीवन की किसी भी घटना के लिए ईश्वर को दोषी नहीं ठहराना चाहिए क्योंकि हर परिणाम के लिए केवल और केवल हमारे ही कर्म जिम्मेवार हैं।
उक्त बातें ब्रह्माकुमारीज़ टिकरापारा में ‘‘मन के विज्ञान का उत्तम शास्त्र – गीता’’ विषय पर हर रविवार को आयोजित वेब श्रृंखला़ के बारहवें सप्ताह में साधकों को ऑनलाइन संबोधित करते हुए सेवाकेन्द्र प्रभारी ब्र.कु. मंजू दीदी जी ने कही। आपने सन्यास योग व कर्मयोग में श्रेष्ठता के संबंध में अर्जुन के द्वारा भगवान से पूछे गए प्रश्न का उत्तर बताते हुए कहा कि कर्म का सन्यास तो हो ही नहीं सकता वास्तव में हमें सन्यास करना है बुरी आदतों का, विकारों का। घर-गृहस्थ में रहते हुए अपनी जिम्मेवारियों व कर्तव्यों को बखुबी निभाना है।
ज्ञान का अर्थ भगवान के लिए घर बार छोड़ना नहीं है बल्कि सही ज्ञान तो वह है जब हम भगवान को अपने घर का एक मुख्य सदस्य बना लें। हर बात उनसे साझा करें। ब्रम्हाकुमारीज़ में हम बहनें समर्पित होती हैं इसका ये अर्थ नहीं है कि हमने घर-गृहस्थ का त्याग किया है। सामाजिक एक्टिविटीज़ में शामिल भी होते हैं। हमने तो परमात्मा को अपने परिवार का मुखिया बनाया है। वे सारे संसार के पालनहार हैं, ईश्वर हमारे परमपिता हैं और सारा संसार ईश्वर का परिवार है इस तरह के दृष्टिकोण से वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना जागृत होती है।
दीदी ने बताया कि व्यक्ति को बांधने वाला कर्म नहीं, उसके कर्म करने की वृत्ति है। कर्मयोग के बिना सन्यास की प्राप्ति नहीं हो सकती। भगवान ने अर्जुन को बताया कि तुम शरीर नहीं एक आत्मा हो और एक योगी आत्म अनुभव करता हुआ हर कर्म को साक्षी भाव से देखता है। ऐसे आसक्ति को त्याग कर कर्म करने वाला पुरूष जल में कमल की भांति पाप में लिप्त नहीं होता। दीदी ने दृष्टांत देकर समझाया कि कैसे अष्टावक्र ने राजा जनक को एक सेकण्ड में जीवन में रहते हुए मुक्ति की अवस्था का अनुभव कराया। और बताया कि मुक्ति से श्रेष्ठ जीवनमुक्ति की अवस्था है। ऐसा व्यक्ति नौ द्वारों वाले इस शरीर रूपी घर में सब कर्म करते हुए आनंदपूर्वक सच्चिदानंद परमात्मा के स्वरूप में स्थित रहता है।
एक अन्य उदाहरण में आपने बताया कि परमात्म ज्ञान से कैसे महर्षि वाल्मिकी के अज्ञान का नाश हुआ और उनका जीवन परिवर्तन हो गया जिससे वे लुटेरे से महर्षि बन गए। मेडिकल साइंस में आत्मा की स्थिति को बताया गया कि आत्मा हाइपोथैलेमस और पीट्यूटरी ग्लैण्ड के मध्य में विराजित रहती है। जिस आत्मा की स्मृति के लिए हम माथे पर तिलक या बहनें माताएं बिन्दी लगाती हैं। इसीलिए मंदिर जाने से पहले चमड़े की चीजें बाहर छोड़कर जाते हैं।
क्लास का प्रसारण यूट्यूब एवं फ्री कांफ्रेन्स कॉल एप के माध्यम से किया जाता है जिससे अनेक साधक इसका लाभ लेते हैं। दीदी जी ने जानकारी दी कि अगले रविवार के सत्र में भगवान ने ध्यान में बैठने का जो साइंटिफिक तरीका बताया है उसके बारे में बताया जायेगा।

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