
रायगढ़ | भीषण गर्मी, सूखते जलस्रोत और जंगलों में भोजन-पानी की कमी के बीच वन्यजीव अब रिहायशी इलाकों की ओर आने को मजबूर हैं। रायगढ़ के चिराईपानी क्षेत्र में एक घायल कोटरी (बार्किंग डियर) की मौत ने वन विभाग की कार्यप्रणाली, रेस्क्यू व्यवस्था और वन्यजीव उपचार प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

जानकारी के अनुसार, बुधवार सुबह करीब 7:30 बजे प्यास और भोजन की तलाश में भटकती एक कोटरी मनोज डनसेना के घर के पास पहुंच गई। इसी दौरान आवारा कुत्तों के झुंड ने उस पर हमला कर दिया। जान बचाने के लिए कोटरी घर के आंगन में घुस गई, लेकिन कुत्तों ने वहां भी उसे बुरी तरह घायल कर दिया। शोर सुनकर आसपास के ग्रामीण मौके पर पहुंचे और लाठियों व पत्थरों की मदद से कुत्तों को खदेड़कर कोटरी को बचाया।
ग्रामीणों ने तत्काल वन विभाग को सूचना दी। आरोप है कि विभाग की टीम करीब पौने दो घंटे बाद सुबह 9:15 बजे मौके पर पहुंची। स्थानीय लोगों का कहना है कि तब तक कोटरी अत्यधिक घायल और सदमे की स्थिति में थी। ग्रामीणों में इस देरी को लेकर नाराजगी देखी गई।

घटना के बाद सोशल मीडिया पर वायरल हुई तस्वीरों ने मामले को और संवेदनशील बना दिया है। तस्वीरों में घायल कोटरी को पैरों से बांधकर उल्टा लटकाकर ले जाते हुए देखा जा सकता है। इन तस्वीरों को लेकर स्थानीय लोगों और पर्यावरण प्रेमियों ने सवाल उठाए हैं कि क्या घायल वन्यजीवों के रेस्क्यू के दौरान यही मानक प्रक्रिया अपनाई जाती है। लोगों का कहना है कि इससे वन विभाग की संवेदनशीलता और रेस्क्यू व्यवस्था पर सवाल खड़े होते हैं।

स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, गंभीर रूप से घायल कोटरी को किसी विशेषज्ञ पशु चिकित्सालय में भर्ती कराने के बजाय प्राथमिक उपचार के बाद देलारी के जंगल में छोड़ दिया गया। आरोप है कि उसे पर्याप्त निगरानी और गहन उपचार नहीं मिल पाया। प्राप्त जानकारी के अनुसार, रेस्क्यू के कुछ घंटों बाद बुधवार शाम को कोटरी की मौत हो गई।
घटना के बाद विभाग द्वारा पोस्टमार्टम की प्रक्रिया पूरी की जा रही है। हालांकि ग्रामीणों और पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि सवाल केवल मौत के कारण का नहीं, बल्कि पूरे रेस्क्यू और उपचार प्रक्रिया की जवाबदेही का भी है। लोगों का मानना है कि यदि समय पर बेहतर उपचार और सुरक्षित रेस्क्यू व्यवस्था होती, तो शायद कोटरी की जान बचाई जा सकती थी।
इस घटना ने कई गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। क्या रायगढ़ वन विभाग के पास घायल वन्यजीवों के सुरक्षित रेस्क्यू और उपचार के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध हैं? क्या मौके पर किसी विशेषज्ञ पशु चिकित्सक की राय ली गई थी? और गंभीर रूप से घायल वन्यजीव को जंगल में छोड़ने का निर्णय किन परिस्थितियों में लिया गया?
वन्यजीव संरक्षण से जुड़े लोगों ने मामले की निष्पक्ष जांच कर जिम्मेदारी तय करने की मांग की है। साथ ही जंगलों में जलस्रोत, उपचार व्यवस्था और रेस्क्यू प्रोटोकॉल को मजबूत करने की आवश्यकता भी जताई जा रही है, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।



