रायगढ़ के जंगलों में आग से हड़कंप- चिरईपानी में धू-धू कर जली वन संपदा, घायल कोटरी की मौत के बाद फिर उठे वन विभाग पर सवाल

रायगढ़ | रायगढ़ वन मंडल एक बार फिर सवालों के घेरे में है। चिरईपानी के जंगलों में लगी आग ने बड़े क्षेत्र की वन संपदा को भारी नुकसान पहुँचाया है। वहीं हाल ही में घायल कोटरी (बार्किंग डियर) की मौत के मामले के बाद विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर ग्रामीणों और पर्यावरण प्रेमियों में नाराजगी बढ़ती नजर आ रही है।
चिरईपानी में आग, लेकिन मौके पर नहीं पहुँचा अमला– स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार चिरईपानी के जंगलों में लगी आग तेजी से फैलती रही और लंबे समय तक जंगल के भीतर धुआं उठता रहा। ग्रामीणों का दावा है कि सूचना दिए जाने के बाद भी जिम्मेदार वन कर्मी मौके पर नहीं पहुँचे।
प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, खबर लिखे जाने तक मौके पर कोई भी वन कर्मी नहीं पहुँचा था। ग्रामीणों का कहना है कि जंगल का बड़ा हिस्सा जलकर राख हो चुका है। हालांकि दोपहर की तेज धूप और धुएं के कम दिखाई देने के कारण दूर से आग की भयावहता पूरी तरह नजर नहीं आ रही, लेकिन अंदरूनी हिस्सों में नुकसान काफी ज्यादा बताया जा रहा है।
ग्रामीणों ने आशंका जताई है कि आग की चपेट में आने से छोटे वन्यजीवों और दुर्लभ वनस्पतियों को भी भारी नुकसान पहुँचा हो सकता है।

कोटरी की मौत के बाद बढ़ी नाराजगी – कुछ दिन पहले चिरई पानी क्षेत्र में कुत्तों के हमले में घायल एक कोटरी की मौत हो गई थी। स्थानीय लोगों का आरोप था कि समय पर बेहतर उपचार और रेस्क्यू नहीं मिलने से वन्यजीव की जान नहीं बच सकी। अब फिर चिरईपानी कि आग की घटना के बाद विभाग की सक्रियता पर फिर सवाल उठने लगे हैं।

फायर लाइन और तैयारी पर सवाल – ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने जंगलों में फायर लाइन निर्माण और आग से निपटने की तैयारियों पर सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि यदि समय रहते प्रभावी रोकथाम उपाय किए जाते, तो नुकसान कम हो सकता था।
लोगों ने मांग की है कि
आग लगने के कारणों की जांच हो
मौके पर तैनात अमले की जिम्मेदारी तय की जाए
फायर मैनेजमेंट कार्यों और बजट उपयोग की समीक्षा हो
भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ठोस कार्ययोजना बनाई जाए
पर्यावरण को नुकसान की आशंका – विशेषज्ञों का मानना है कि जंगलों में लगातार लग रही आग से जैव विविधता और पर्यावरण पर गंभीर असर पड़ सकता है। यदि समय रहते प्रभावी “कूलिंग ऑपरेशन” और निगरानी नहीं की गई, तो नुकसान और बढ़ सकता है।
अब देखना होगा कि वन विभाग इस पूरे मामले में क्या कार्रवाई करता है और चिरईपानी आग की घटना की जांच किस स्तर तक पहुँचती है।
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