डेटा की अंधी दौड़ में छूटी बुनियादी कॉलिंग: 5G के दौर में भी गांवों में नेटवर्क क्यों बना सिरदर्द?

विशेष जमीनी रिपोर्ट”
आज की पूरी तकनीक हाई-स्पीड डेटा पर केंद्रित हो चुकी है, लंबी दूरी की निर्बाध कॉलिंग पर नहीं।” यही कारण है कि जहां शहरों में 5G की सुपरफास्ट स्पीड के दावे हो रहे हैं, वहीं दूरदराज के ग्रामीण और वनांचल इलाकों में आज भी एक साधारण फोन कॉल करने के लिए लोगों को छतों, पेड़ों या पहाड़ों की ओर दौड़ना पड़ रहा है।
आधे से अधिक ग्रामीण आबादी का काम आज भी केवल साफ आवाज में बात करने और जरूरी एसएमएस (ओटीपी, बैंक मैसेज) से चल सकता है, लेकिन कंपनियां उन्हें महंगे डेटा प्लान और कमजोर कवरेज के जाल में उलझाए हुए हैं।
जब 1 टावर से 35 किमी दूर तक होती थी बात (2006 का दौर) – साल 2006 के दौर को याद करें तो रायगढ़ की लाल टंकी पर लगे शुरुआती 2G टावर से 30 से 35 किलोमीटर दूर तोलगे पहाड़ तक साफ बातचीत हो जाती थी।
कारण: 2G नेटवर्क मुख्य रूप से ‘लो-फ्रीक्वेंसी’ (900 MHz) पर काम करता था, जिसकी तरंगें बिना कमजोर पड़े पहाड़ों और जंगलों को पार कर बहुत दूर तक जाती थीं। उस समय प्राथमिकता पूरे क्षेत्र में मजबूत सिग्नल पहुंचाना था, न कि इंटरनेट की स्पीड।
5G का दायरा सिमटा, गांव क्यों छूट रहे पीछे? – आज की 5G तकनीक हाई-स्पीड डेटा देने के लिए ‘हाई-फ्रीक्वेंसी’ पर चलती है। भौतिकी का सीधा नियम है—फ्रीक्वेंसी जितनी ज्यादा होगी, उसकी दूरी उतनी ही कम होगी।
5G के मिड और हाई-बैंड का दायरा सीमित (कुछ सौ मीटर से 1-2 किलोमीटर) होता है और यह दीवारों या पेड़ों से आसानी से ब्लॉक हो जाता है।
शहरों में हर नुक्कड़ और खंभे पर छोटे एंटीना लगाकर 5G चला दिया जाता है, लेकिन मीलों फैले जंगलों और गांवों में इतने टावर लगाना कंपनियों के लिए आर्थिक रूप से कठिन होता है। नतीजा यह कि ग्रामीण इलाके सिग्नल विहीन होते जा रहे हैं।
साइकिल बनाम भारी ट्रक- आज फोटो-वीडियो भी क्यों अटकते हैं?अक्सर लोगों का सवाल होता है कि पहले 2G में भी फोटो धीरे-धीरे पहुंच जाती थी, पर आज 5G होने पर भी फाइलें क्यों अटकती हैं?
2G का दौर (संकरी सड़क, हल्की साइकिल): तब नेटवर्क भले धीमा था, लेकिन एक फोटो मात्र 50 से 100 KB की होती थी। हल्की फाइल होने के कारण वह बिना रुके अपनी मंजिल तक पहुंच जाती थी।
5G का दौर (चौड़ी सड़क, भारी-भरकम ट्रक): आज 5G की सड़क चौड़ी है, लेकिन मोबाइल कैमरों और ऐप्स के कारण एक फोटो या वीडियो 5 MB से 200 MB (भारी ट्रक जैसी) हो चुकी है। साथ ही फोन में बैकग्राउंड में दर्जनों ऐप्स लगातार डेटा खींचते हैं। जैसे ही सिग्नल जरा सा कमजोर होता है, यह भारी डेटा जाम हो जाता है और अपलोडिंग रुक जाती है।
‘प्योर 4G/5G’ का संकट: सिग्नल हटते ही फोन बन जाता है डब्बा – जो नेटवर्क पूरी तरह ‘ऑल-4G/5G’ पर आधारित हैं, उनमें 2G का बैकअप (फॉलबैक) नहीं होता।
जिन नेटवर्कों में पुराना 2G ढांचा चालू है, वहां 4G कमजोर होने पर फोन 2G पर आकर कम से कम बात जारी रखता है।
लेकिन केवल 4G/5G आधारित नेटवर्क में सिग्नल कम होते ही सीधे ‘No Service’ आ जाता है। ऐसे में वनांचल या दूरदराज के रास्तों पर 112, एम्बुलेंस या पुलिस को इमरजेंसी कॉल लगाना भी नामुमकिन हो जाता है।
न चाहते हुए भी महंगा रीचार्ज कराने की मजबूरी – ग्रामीण क्षेत्रों में बुजुर्गों, किसानों और सामान्य उपभोक्ताओं को सिर्फ अपना फोन चालू रखना है, लेकिन टेलीकॉम कंपनियों ने सस्ते वॉइस-ओनली प्लान लगभग बंद कर दिए हैं
मजबूरी में हर महीने 1.5 GB या 2 GB प्रतिदिन वाले महंगे डेटा प्लान लेने पड़ते हैं।
जिस डेटा का ग्रामीण उपयोग ही नहीं करते, वह हर रात अपने आप एक्सपायर हो जाता है। यह सीधे तौर पर गांव के गरीब तबके की जेब पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ है।
समाधान: नीतिगत बदलाव की जरूरत – सस्ते कॉलिंग प्लान: सरकार और ट्राई (TRAI) को टेलीकॉम कंपनियों के लिए केवल वॉयस और एसएमएस वाले ‘किफायती बेसिक प्लान’ अनिवार्य करने चाहिए।
मजबूत वॉयस कनेक्टिविटी – यूएसओएफ (USOF) फंड का उपयोग सिर्फ हाई-स्पीड डेटा के लिए नहीं, बल्कि दूरदराज के अंतिम गांव तक मजबूत लो-बैंड वॉयस कनेक्टिविटी सुनिश्चित करने के लिए होना चाहिए, ताकि तकनीक आम नागरिक की जेब और जरूरत के अनुकूल बने।
फोटो सांकेतिक

